बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी से बनाए शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा :- हाई कोर्ट

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बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी से बनाए शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा :- हाई कोर्ट

बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी से बनाए शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा :- हाई कोर्ट



बिलासपुर। दुष्कर्म के मामले में हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ पीड़िता की अपील पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी से बनाए शारीरिक संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जाएगा।

ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया है। छत्तीसगढ़ बेमेतरा जिले की निवासी दुष्कर्म पीड़िता ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

25 जुलाई 2022 की सुबह चार बजे जब पीड़िता शौच के लिए जा रही थी तो आरोपित उससे मिला और अपने साथ घर ले गया और दुष्कर्म किया। जब आरोपित ने संबंध बनाया तो वह पहले से ही तीन माह के गर्भ से थी। लोक लाज के भय से उसने इस बारे में किसी को जानकारी नहीं दी। पति के पूछने पर घटना की जानकारी दी, इसके बाद थाने में रिपोर्ट लिखाई।

याचिका में बताया कि वह कृषि महाविद्यालय में मजदूरी करने जाती थी। गांव के दूसरे लोग भी काम करने आते थे। आरोपित भी वहां काम करता था। 19 जून 2022 को आरोपित ने उससे बात करना शुरू किया और कहा कि वह उससे शादी करेगा। इसके बाद उसने शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहा।

पुलिस ने आरोपित के खिलाफ जुर्म दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया। ट्रायल कोर्ट ने गवाहों एवं मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपित को दोषमुक्त कर दिया। इस पर पीड़िता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकरण में ऐसा कोई सबूत नहीं है कि पीड़िता की उम्र 18 साल से कम थी।

याचिकाकर्ता के बयानों से साफ है कि आरोपी ने पीड़िता की सहमति से शारीरिक संबंध बनाया था। कोर्ट ने कहा, एक बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी और सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध में दुष्कर्म का मामला नहीं बनता है। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी बालिग और शादीशुदा महिला के साथ उसकी मर्जी और सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध को रेप नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

गवाहों और साक्ष्यों पर कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी ने पीड़िता को किसी प्रकार की धमकी या डर दिखाकर सहमति प्राप्त की थी। साथ ही, यह भी साबित नहीं हो सका कि पीड़िता ने किसी भ्रम या धोखे में आकर संबंध बनाए। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पीड़िता पहले से शादीशुदा और गर्भवती थी। ऐसे में यह मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं कि उसने बिना सहमति के संबंध बनाए। कोर्ट के अनुसार, प्रस्तुत तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि संबंध सहमति से बनाए गए थे।

यह फैसला सहमति और यौन अपराधों की कानूनी परिभाषा को लेकर एक बार फिर व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। कानून विशेषज्ञों और सामाजिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मामलों में केवल आरोपों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों, परिस्थितियों और दोनों पक्षों के बयानों का गहराई से परीक्षण किया जाना अत्यंत आवश्यक होता है।

खासतौर पर सहमति जैसे संवेदनशील पहलू को समझने के लिए यह देखना जरूरी होता है कि वह स्वतंत्र इच्छा से दी गई थी या किसी दबाव, भय, धोखे या भ्रम के तहत। न्यायालयों के सामने यह एक जटिल चुनौती होती है, जहां उन्हें पीड़ित के अधिकारों की रक्षा और आरोपी के खिलाफ निष्पक्ष न्याय के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। ऐसे निर्णय यह भी संकेत देते हैं कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और न्यायिक प्रक्रिया में तथ्यों की सटीकता, गवाहों की विश्वसनीयता और मेडिकल साक्ष्यों की भूमिका बेहद अहम होती है।


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