छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने निचली अदालतों, थानों और संबंधित विभागों को यौन अपराध मामलों में संवेदनशील भाषा अपनाने के दिये निर्देश
'चरित्रहीन', 'अस्मत' और 'शील भंग' जैसे शब्दों से बचने पर दिया गया जोर
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ प्रदेश (chhattisgarh) में यौन अपराध और अन्य संवेदनशील मामलों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान इस्तेमाल होने वाली भाषा में बड़ा और सकारात्मक बदलाव होने जा रहा है। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य की निचली अदालतों, पुलिस थानों और संबंधित विभागों को यौन अपराध मामलों में संवेदनशील भाषा अपनाने के निर्देश दिए हैं। 'चरित्रहीन', 'अस्मत' और 'शील भंग' जैसे शब्दों से बचने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य FIR दर्ज होने से लेकर जांच, सुनवाई और फैसले तक पीड़ित की गरिमा, निजता और सम्मान की रक्षा करना है। साथ ही पीड़ित के चरित्र, कपड़ों, निजी जीवन या सामाजिक स्थिति को लेकर किसी तरह की पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणी से बचने को कहा गया है।
पुरानी/असंवेदनशील भाषा --- प्राथमिकता वाली भाषा
प्रॉसिक्यूट्रीक्स ---- सर्वाइवर / विक्टिम / शिकायतकर्ता
लाचार महिला / बेबस औरत --- महिला / सर्वाइवर
अस्मत / शील भंग-----शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन / यौन हमला
हवस यौन हिंसा
चरित्रहीन ----- साक्ष्य और कानून आधारित विवरण
कीप / रखैल ----पार्टनर / महिला मित्र
वेश्या / कॉलगर्ल -----सेक्स वर्कर
किन्नर / हिजड़ा ----संदर्भानुसार सम्मानजनक लैंगिक पहचान
अनपढ़ / देहाती गवाह -----विवेकशील / समझदार या तथ्यात्मक परिचय
पुलिस थाने से अदालत तक बदलेगा व्यवहार
नई व्यवस्था का असर केवल अदालतों की भाषा तक सीमित नहीं रहेगा। पुलिस थानों में FIR लिखने और जांच के दौरान भी पीड़ितों के साथ सम्मानजनक और गैर-भेदभावपूर्ण भाषा का इस्तेमाल करना होगा। संवेदनशील मामलों में पीड़ित की पहचान और निजता की रक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया के दौरान पीड़ित को अनावश्यक सामाजिक या मानसिक परेशानी से बचाना है। गवाहों के साथ भी सम्मानजनक व्यवहार करने के निर्देश दिए गए हैं। आवश्यकता पड़ने पर संवेदनशील मामलों में इन-कैमरा ट्रायल की व्यवस्था का पालन किया जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के परिपालन में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य की सभी अधीनस्थ अदालतों (निचली अदालतों), पुलिस थानों और संबंधित विधिक विभागों को संवेदनशील तथा लैंगिक न्याय (जेंडर जस्टिस) पर आधारित शब्दावली अपनाने के स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं।
व्यवस्था के मुख्य बिंदु और उद्देश्य:
गरिमा और निजता की सुरक्षा: इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज होने से लेकर विवेचना, अदालती सुनवाई और अंतिम फैसले तक पीड़ित की गरिमा, निजता और आत्मसम्मान को पूरी तरह अक्षुण्ण बनाए रखना है।
पूर्वाग्रह से मुक्ति: अदालती कार्यवाहियों या पुलिस जांच के दौरान पीड़ित के चरित्र, निजी जीवन, व्यक्तिगत पृष्ठभूमि या सामाजिक स्थिति को लेकर किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक या पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणी करने पर पूर्णतः रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं।
संवेदनशील न्यायिक तंत्र: इस कदम से लैंगिक समानता और संवेदनशीलता को बढ़ावा मिलेगा, जिससे पीड़ितों को न्याय प्रक्रिया के दौरान किसी अतिरिक्त मानसिक आघात से न गुजरना पड़े।
इस व्यवस्था का उद्देश्य एफआईआर दर्ज होने से लेकर जांच, न्यायिक कार्यवाही और अंतिम फैसले तक पीड़ित की गरिमा, निजता और सम्मान बनाए रखना है। किसी पीड़ित के चरित्र, निजी जीवन या सामाजिक स्थिति को लेकर पूर्वाग्रहपूर्ण टिप्पणी से भी बचने को कहा गया है।
24 जिला एवं सत्र न्यायालयों को भेजा आदेश
हाई कोर्ट ने अपने निर्देशों की प्रति प्रदेश के सभी 24 जिला एवं सत्र न्यायालयों, स्टेट ज्यूडिशियल एकेडमी, राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, मुख्य सचिव, गृह विभाग, डीजीपी तथा महिला एवं बाल विकास विभाग को भेजी है। संबंधित संस्थाओं को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद राज्यों में लागू व्यवस्था
यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाहाबाद हाई कोर्ट से जुड़े मामले में स्वतः संज्ञान लेने और सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस अनिरुद्ध बोस की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय समिति की सिफारिशों के बाद सामने आया है। इस पहल का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में ऐसी भाषा और व्यवहार को खत्म करना है, जिससे पीड़ित के प्रति पूर्वाग्रह पैदा हो या अपराध की गंभीरता कमतर दिखाई दे। अब न्यायिक भाषा में घटना के विवरण के साथ-साथ पीड़ित की गरिमा की रक्षा को भी अहम माना जाएगा।



