राज्य सरकार को बिलासपुर हाईकोर्ट ने लंबित महंगाई भत्ता (डीए) के भुगतान को लेकर जारी किया नोटिस

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राज्य सरकार को बिलासपुर हाईकोर्ट ने लंबित महंगाई भत्ता (डीए) के भुगतान को लेकर जारी किया नोटिस

राज्य सरकार को बिलासपुर हाईकोर्ट ने लंबित महंगाई भत्ता (डीए) के भुगतान को लेकर जारी किया नोटिस

न्यायालय ने शासन को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के दिये निर्देश



राज्य सरकार को बिलासपुर हाईकोर्ट ने लंबित महंगाई भत्ता (डीए) के भुगतान को लेकर नोटिस जारी किया है। न्यायालय ने शासन को चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।

प्रदेश के तीन लाख से अधिक शासकीय अधिकारी-कर्मचारियों का वर्ष 2017 से महंगाई भत्ता लंबित बताया जा रहा है।कर्मचारी- अधिकारी फेडरेशन ने लंबित महंगाई भत्ता के भुगतान को लेकर विगत गुरुवार को हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसकी सोमवार को सुनवाई हुई।

फेडरेशन के पदाधिकारियों का कहना है कि हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय की ओर से महंगाई भत्ता और महंगाई राहत (डीआर) को कर्मचारियों व पेंशनरों का वैधानिक अधिकार मानते हुए भुगतान का आदेश दिया है। उसी निर्णय के परिपालन में राज्य में भी लंबित महंगाई भत्ता और राहत भुगतान कराने की मांग को लेकर याचिका दायर की गई थी।

छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन के प्रांतीय संयोजक कमल ने बताया कि छह फरवरी को हुई बैठक में न्यायालय जाने का निर्णय लिया गया था। उनका कहना है कि वर्ष-2017 से लंबित डीए और एरियर भुगतान को लेकर लगातार ज्ञापन सौंपे जा रहे हैं, लेकिन अब तक सुनवाई नहीं हुई। फेडरेशन कर्मचारी हित में संवाद, सड़क और न्यायालय तीनों स्तरों पर संघर्षरत है।

मुख्य बिन्दु::-///.....

लंबित DA मामला: कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन ने 2017 से लंबित महंगाई भत्ते के भुगतान को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई हुई।

नोटिस और समय सीमा: कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा महंगाई भत्ते को कर्मचारियों का वैधानिक अधिकार (Legal Right) मानने के बाद यह याचिका दायर की गई है।

प्रभावित कर्मचारी: इस फैसले से छत्तीसगढ़ के तीन लाख से अधिक शासकीय अधिकारी-कर्मचारी प्रभावित हैं। 

यह कानूनी कदम सरकार पर बकाया महंगाई भत्ते के भुगतान के लिए दबाव बना रहा है, जिसे अब एक 'वैधानिक अधिकार' के रूप में देखा जा रहा है। 


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