छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक तरफ कड़े रुख का दावा तो दूसरी ओर 50 से अधिक बड़े अधिकारियों के खिलाफ जांच और अभियोजन की मंजूरी अटकी
विपक्ष ने सरकार पर कार्रवाई में देरी का लगाया आरोप, वहीं हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब
अनुमति ही नहीं मिल पाने के चलते जांच एजेंसियां आगे की कार्रवाई न करने पर विवश
छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक तरफ कड़े रुख का दावा किया जा रहा है, तो वहीं दूसरी ओर 50 से अधिक बड़े आईएएस आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों के खिलाफ जांच और अभियोजन की मंजूरी अटकी हुई है। ईओडब्ल्यू/एसीबी द्वारा मामले भेजे जाने के बावजूदकई मामलों में कार्रवाई न होने से जांच ठप पड़ी है। मामला जैसे के तैसे पडे है।
आपको बता दें कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के घेरे में आए करीब 50 वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ जांच प्रस्ताव लंबित पड़ी हैं। हालांकि EOW और ACB ने कई मामलों में राज्य सरकार से अभियोजन स्वीकृति मांगी है, लेकिन 9 अधिकारियों के खिलाफ अब तक अनुमति ही नहीं मिल पाई है जिसके चलते जांच एजेंसियों आगे की कार्रवाई न करने पर विवश हैं। उन्हें अनुमति मिलने का इंतजार है। ईओडब्ल्यू और एसीबी ने जिन मामलों को लेकर उन अधिकारियों के खिलाफ जांच की सिफारिश की है, वे कई महीनों से लंबित हैं।
13 दिसंबर 2023 से 31 दिसंबर 2025 तक, 50 बड़े अफसर जांच के दायरे में हैं, जिनमें से नौ के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति अभी भी लंबित है।
हाईकोर्ट की टिप्पणी: हाईकोर्ट ने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई न करने और अभियोजन की अनुमति न देने पर सरकार से जवाब मांगा है। विपक्ष और जनता के बीच नाराजगी को देखते हुएहाईकोर्ट ने सरकार को शीघ्र कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
हालिया कार्रवाई: सरकार ने दावों के विपरीत 200 करोड़ रुपये के शराब घोटाले में 22 आबकारी अधिकारियों को निलंबित किया है, लेकिन बड़े प्रशासनिक अफसरों पर अभी भी संशय बना हुआ है।
प्रमुख मामले: महादेव एप घोटालाकोयला लेवी घोटालाऔर वन विभाग की अनियमितताओं में कई अफसर संलिप्त पाए गए हैं।
लगातार लंबित स्वीकृतियों ने प्रशासनिक जवाबदेही और पारदर्शिता पर बहस छेड़ दी है। विपक्ष जहां सरकार पर कार्रवाई में देरी का आरोप लगा रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि सभी मामलों में विधिक प्रक्रिया के तहत निर्णय लिया जाएगा। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि लंबित स्वीकृतियां कब मिलती हैं और क्या जांच एजेंसियां इन मामलों में निर्णायक कार्रवाई कर पाती हैं।
नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सदन में 13 दिसंबर 2023 से 31 दिसंबर 2025 तक का लिखित ब्यौरा पेश किया। इस रिपोर्ट में चर्चित महादेव एप सट्टा घोटाला, कोयला लेवी घोटाला, शराब घोटाला और वन विभाग की योजनाओं में हुई भारी अनियमितताओं में अधिकारियों के आरोप तय किए गए हैं।
आईएएस इफ्फत आरा: पाठ्यपुस्तक निगम में कागज खरीदी और परिवहन निविदा में गड़बड़ी के आरोप। (लंबित: 13 अप्रैल 2024 से)
आईएएस संजय अलंग: समाज कल्याण विभाग में निराश्रित राशि में अनियमितता का मामला। (लंबित: 29 जनवरी 2025 से)
आईएएस सुधाकर खलखो: माटीकला बोर्ड में सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप।
अन्य आइएफएस अधिकारी: अनूप भल्ला, रमेश चंद्र दुग्गा, केके खेलवार, लक्ष्मण सिंह, चूड़ामणि और एसपी मशीह के खिलाफ भी भ्रष्टाचार और गबन के मामलों में जांच की अनुमति प्रतीक्षित है।
कोयला घोटाले की तपिश अब भी बरकरार है। आइएएस समीर बिश्नोई के खिलाफ जनवरी 2026 में जांच की अनुमति मिलने के बाद किरण कौशल, भीम सिंह और जय प्रकाश मौर्य जैसे अधिकारियों पर भी जांच की आंच पहुंच गई है। वहीं, शराब घोटाले में पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड, अनिल टुटेजा और निरंजन दास पहले से ही रडार पर हैं।
स्वास्थ्य विभाग में सीजीएमएससी निविदा घोटाले ने भी सरकार की मुश्किलें बढ़ाई हैं। इसमें आइएएस चंद्रकांत वर्मा, अभिजीत सिंह, सीआर प्रसन्ना और कार्तिकेय गोयल के विरुद्ध जांच जारी है। राजस्व विभाग में पटवारी भर्ती परीक्षा की गड़बड़ियों में आइएएस रमेश शर्मा का नाम भी शामिल है।
महादेव एप सट्टा घोटाले ने पुलिस महकमे की छवि पर गहरा दाग लगाया है। आईपीएस आनंद छाबड़ा, अजय यादव, आरिफ शेख, प्रशांत अग्रवाल, अभिषेक पल्लव और ओपी पाल के खिलाफ जांच चल रही है। इन पर सट्टा प्रमोटरों को संरक्षण देने और अवैध राशि वसूलने के गंभीर आरोप हैं।
दूसरी ओर, वन विभाग में नीलगिरी पौधा खरीदी और कैंपा मद के दुरुपयोग के मामलों में आईएफएस अरुण प्रसाद, एके बोआज और विवेक आचार्य समेत कई अन्य अफसरों के खिलाफ जांच की अनुमति फिलहाल नहीं मिल पाई है, जिससे जांच एजेंसियों के हाथ बंधे हुए हैं।



